कुछ समय से एक नया आंदोलन देखने को मिल रहा है जहां IPC के स्थान पर प्रस्तावित BNS (भारतीय न्याय संहिता) के एक प्रावधान गृह मंत्री अमित शाह के एक वक्तव्य के पश्चात विवाद अधिक बढ़ गया है, जहां लोगों को आपत्ति इस बात पर है कि वाहन चालकों द्वारा दुर्घटना होने की स्तिथि में 7 वर्ष के कारावास और घटना स्थल से भाग जाने की स्तिथि में 10 वर्ष के कारावास का प्रावधान है। चलिए पहले सीधे प्रावधानों को ही देख लेते हैं

हिन्दी अनुवाद
104. (1) जो कोई उतावलेपन से या उपेक्षापूर्ण किसी ऐसे कार्य से किसी व्यक्ति की मृत्यु कारित करेगा, जो आपराधिक मानव वध की कोटि में नहीं आता, वह दोनों में से किसी भांति के कारावास से, जिसकी अवधि सात वर्ष की हो सकेगी और जुर्माने के लिए भी दायी होगा।
(2) जो कोई उतावलेपन या उपेक्षापूर्ण किसी कार्य से किसी व्यक्ति की मृत्यु कारित करेगा, जो आपराधिक मानव वध नहीं है और घटना स्थल से निकलकर भागेगा या घटना के तत्काल पश्चात्, पुलिस अधिकारी या मजिस्ट्रेट को घटना की सूचना देने में असफल रहेगा, किसी भी अवधि की कारावास से जो दस वर्ष तक का हो सकेगा, के दंड से दंडनीय होगा और जुर्माने के लिए भी दायी होगा।
विश्लेषण :
उपेक्षापूर्ण कृत्य किसी पूर्वानुमान के अभाव में किए जाते हैं अर्थात ऐसे कार्य जिसके परिणाम के बारे में कोई जानकारी करने वाले को नहीं होती। जबकि उतावलापन मन की एक स्थिति है जो एक बार परिणाम का अनुमान लगा लेती है लेकिन कार्य करने वाले द्वारा उसे नज़रअंदाज कर दिया जाता है।
वो मुख्य बिन्दु जो इस प्रावधान में हैं वो ये कि
- यह प्रवधान किसी भी स्तिथि में केवल वाहन चालकों के विषय में नहीं है तथा ये उपेक्षापूर्ण (negligence) व उतावलेपन (rash) कृत्य से कारित मृत्यु के विषय में है जिसमें विभिन्न प्रकार की स्तिथियाँ आती हैं।
- दुर्घटना से मृत्यु होने की स्तिथि में कितना जुर्माना देना होगा इसका कोई विवरण या स्पष्टीकरण नहीं दिया गया है।
- कारावास 10 वर्ष का नहीं है बल्कि कारावास की अधिकतम सीमा 10 वर्ष है और सामान्यतः किसी भी अपराध में अधिकतम दंड नहीं दिया जाता है। यदि कारावास की अवधि के निर्धारण की बात करें तो माननीय उच्चतम न्यायालय के निर्देशानुसार कारावास की अवधि को मामलों को गंभीर या फिर हल्का करने वाले कारकों को ध्यान में रख कर निर्धारित करना चाहिए।
वास्तविक संभावित प्रभाव
जिन विषयों को लेकर विवाद हो रहा है वो वास्तविक प्रावधान नहीं है और ऐसे ही समतुल्य प्रावधान वर्तमान समय में भी हैं, परंतु इस प्रावधान में प्रयुक्त उपेक्षापूर्ण(negligence) और उतावलेपन(rash) कृत्य के निर्धारण के मानकों पर प्रश्न उठाया जा सकता है। मजिस्ट्रेट और पुलिस अधिकारी को सूचित करने के तरीके व समय सीमा के साथ-साथ जुर्माने की राशि के विषय में भी स्पष्टीकरण की आवश्यकता है। आने वाले समय में प्रावधानों के प्रभावी होने पर माननीय उच्च न्यायालयों एवं उच्चतम न्यायालय द्वारा इन प्रावधानों का उचित विवेचन और व्याख्यान भी किया जाएगा।
निष्कर्ष
इस प्रवधान को पूर्ण रूप से वाहनचालकों से संबंधित बताना निश्चित रूप से निराधार एवं अनुचित हैं, हालांकि वाहनचालकों द्वारा दुर्घटना में हुई मृत्युओं के कुछ मामले इस प्रावधान के अंतर्गत अवश्य आएंगे, सभी नहीं। इस प्रावधान के अंतर्गत डॉक्टर के उपेक्षापूर्ण कृत्य द्वारा कारित मृत्यु भी आती हैं। जैकब मैथ्यू बनाम पंजाब राज्य एवं अन्य के मामले में उच्चतम न्यायालय द्वारा डॉक्टर के उपेक्षापूर्ण व उतावलेपन में किए गए कृत्य से कारित मृत्यु से जुड़े मामलों के लिए जरूरी दिशा निर्देश दिए गए हैं। इस प्रावधान में अन्य विभिन्न प्रकार के अपराध, जैसे – आतिशबाजी, पुलिस अधिकारी की लापरवाही, नशे की स्तिथि में किसी व्यक्ति द्वारा किए उपेक्षापूर्ण कृत्य के कारण किसी व्यक्ति की मृत्यु होने के मामले इत्यादि आते हैं। इस आंदोलन की विषयवस्तु केवल वाहनचालकों से हटकर आवश्यक स्पष्टीकरण पर हो तो अधिक लाभप्रद होगा।